राफेल घोटाला भारत का सबसे बड़ा रक्षा घोटाला-शैलजा

0
116

अनूप कुमार सैनी: चण्डीगढ़ – पूर्व केंद्रीय मंत्री व राज्यसभा सांसद शैलजा ने जारी ब्यान में कहा कि राफेल घोटाला भारत का सबसे बड़ा रक्षा घोटाला है, जो साफ तौर से भ्रष्टाचार का स्पष्ट मामला है। मोदी सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के सामने असत्य कथन व झूठे बयान देकर संसद के विशेषाधिकार का उल्लंघन किया गया है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार के ‘झूठ के पुलिंदे’ का भंडाफोड़ कर दिया।
राफेल घोटाला सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने, देशहित के साथ समझौता करने, देश की सुरक्षा को कमजोर करने, सरकारी कंपनी, ‘हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल)’ की अनदेखी करने एवं ‘पूंजीपति मित्रों’ को फायदा पहुंचाने का दुखद एवं घिनौना वृत्तांत है।

राफेल घोटाले में 7 महत्वपूर्ण तथ्य हैं
1. ‘राफेल’ का मूल्य – सरकारी खजाने को 41,205 करोड़ का नुकसान!

कांग्रेस की यूपीए सरकार के दौरान 12 दिसंबर, 2012 को खुली अंतर्राष्ट्रीय बोली के अनुसार 126 राफेल लड़ाकू जहाजों में से प्रत्येक लड़ाकू जहाज का मूल्य 526.10 करोड़ रु. यानि 36 लड़ाकू जहाजों का मूल्य 18,940 करोड़ रु. था। मोदी सरकार ने 36 राफेल लड़ाकू जहाज 7.5 बिलियन यूरो (1670.70 करोड़ रु. प्रति लड़ाकू जहाज) यानि 36 जहाजों के लिए 60,145 करोड़ रु. में खरीदे। इस सौदे में सरकारी खजाने को 41,205 करोड़ रु. का चूना लगा।
2. 30,000 करोड़ रु. का ‘ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट’ पीएसयू – हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हाथों से लेकर अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस कंपनी को दे दिया गया।
A) 13.03.2014 को एचएएल एवं राफेल-डसॉल्ट एविएशन के बीच एक वर्कशेयर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए गए।
B) 25.03.2015 को डसॉल्ट की सीईओ बैंगलोर में एचएएल की फैक्ट्री में गए और एयरफोर्स चीफ के सामने एचएएल-डसॉल्ट के संबंधों के बारे में बात की।
C) 08.04.2015 को विदेश सचिव ने भी एचएएल-राफेल के समझौते को स्वीकार कर लिया।
D) रिलायंस डिफेंस लिमिटेड एवं रिलायंस एयरोस्ट्रक्चर लिमिटेड को एचएएल के चालीस सालों के अनुभव के सामने लड़ाकू जहाज बनाने का शून्य अनुभव है।
प्रधानमंत्री मोदी ने एचएएल से 30,000 करोड़ रु. का कॉन्ट्रैक्ट छीनकर पब्लिक सेक्टर की कंपनी से ज्यादा निजी कंपनी के हितों का ख्याल क्यों रखा?
रिलायंस कंपनी की वेबसाईट आरइन्फ्रा ने यह दावा भी किया है कि उन्हें ‘30,000 करोड़ रु. का ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट डसॉल्ट एविएशन से मिल गया है। इसके अलावा यह भी दावा किया है कि उन्हें अतिरिक्त 1 लाख करोड़ रु. का ‘लाईफ साइकल कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट’ भी मिल गया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने पब्लिक सेक्टर की कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को दरकिनार कर 30,000 करोड़ रु. का डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट 12 दिन पुरानी कंपनी, यानि रिलायंस डिफेंस को दे दिया। रिलायंस डिफेंस लिमिटेड (जिसे राफेल-डसॉल्ट एविएशन से 30,000 करोड़ रु. का कॉन्ट्रैक्ट मिला) का गठन 10.04.2015 को प्रधानमंत्री द्वारा फ्रांस में 36 राफेल लड़ाकू जहाजों को खरीदने की घोषणा करने से 12 दिन पहले 28.03.2015 को ही किया गया था।
3. ‘डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीज़र’, ‘कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी’ एवं ‘डिफेंस एक्विजि़शन काउंसिल’ को उठाकर ताक पर रख दिया
प्रधानमंत्री मोदी ने 10 अप्रैल, 2015 को 36 लड़ाकू जहाजों को खरीदने की घोषणा के वक्त अनिवार्य ‘डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीज़र’ (डीपीपी) को उठाकर ताक पर क्यों रख दिया? डीपीपी की शर्तों, यानि ‘कॉन्ट्रैक्ट नेगोसिएशन कमिटी’ (सीएनसी) एवं ‘प्राईस नेगोसिएशन कमिटी’ (पीएनसी) द्वारा ‘सही मूल्य पता’ करने की प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया गया?
मोदी ने ‘डिफेंस एक्विजि़शन काऊंसिल’ (डीएसी) को दरकिनार क्यों कर दिया? 10.04.2015 को प्रधानमंत्री ने पेरिस में 36 राफेल लड़ाकू जहाज खरीदे जाने की घोषणा की। लेकिन 36 राफेल जेट खरीदने के लिए ‘एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी’ (जरूरत की स्वीकृति) डिफेंस एक्विजि़शन काउंसिल द्वारा एक महीने बाद 13.05.2015 को मिली। डीएसी का निर्णय प्रधानमंत्री को एक महीने पहले कैसे मालूम था?
प्रधानमंत्री ने 10 अप्रैल, 2015 को 36 लड़ाकू जहाज खरीदने की घोषणा के वक्त तक नियमानुसार ‘कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी’ की पूर्व अनुमति क्यों नहीं ली, जो डीपीपी के अनुसार अनिवार्य है? कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने एक साल चार महीने बाद, यानि 24.08.2016 को कार्य उपरांत अनुमति प्रदान की।
8 अप्रैल, 2015 को विदेश सचिव ने दो दिन बाद प्रधानमंत्री की फ्रांस यात्रा के दौरान राफेल जहाज खरीदने बारे किसी भी प्रस्ताव को खारिज कर दिया? क्या प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी देश को बताएंगे कि 8 अप्रैल, 2015 से 10 अप्रैल, 2015 के बीच 48 घंटों में ऐसा क्या हो गया कि उन्होंने आनन-फानन में फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू जहाज खरीदने की घोषणा कर डाली?
4. देश की सुरक्षा से समझौता – लड़ाकू जहाजों की संख्या घटाई एवं ‘ट्रांसफर ऑफ टेक्नॉलॉजी’ की बलि दे डाली।
भारतीय वायु सेना को कम से कम 126 ऑपरेशनल लड़ाकू जहाजों की जरूरत है। कांग्रेस की यूपीए सरकार द्वारा जारी ‘रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल’ (आरएफपी) का आधार यही है, जिसमें साफ कर दिया गया था कि एचएएल ‘ट्रांसफर ऑफ टेक्नॉलॉजी’ के साथ 108 लड़ाकू जहाजों का निर्माण करेगा।
मोदी ने भारतीय वायु सेवा के लिए खरीदे जाने वाले लड़ाकू जहाजों की संख्या 126 से घटाकर 36 क्यों कर दी? इस मामले में भारतीय वायुसेना का परामर्श क्यों नहीं लिया गया? प्रधानमंत्री ने भारत को किए जाने वाले ‘ट्रांसफर ऑफ टेक्नॉलॉजी’ की बलि क्यों दे डाली?
5. प्रधानमंत्री मोदी ने राफेल का ‘बेंचमार्क मूल्य’ 5.2 बिलियन यूरो से बढ़ा कर 8.2 बिलियन यूरो क्यों कर दिया।

LEAVE A REPLY