न्याय पाने के लिए कब तक सड़क पर चिल्लाती रहेगी जनता?

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कुरुक्षेत्र राकेश शर्मा: देश हर रोज नई नई बुलंदियो को छु रहा है लेकिन इतना होने के बाबजूद भी देश में अपनी बात को रखने उसको कहने ओर न्याय पाने की जब बात आती है यो इसी देश की जनता ना जाने क्या कदम उठा लेती है क्या देश के कानून पर देश की जनता को कोई भरोसा नही है या फिर यह कहे कि वो सच को सामने लाने के लिए सड़को पर उतर कर धरने , प्रदर्शनों का सहारा लेने को मजबूर हो रहे है। हाल ही मे जजों के द्वारा कही हुई बात से करोड़ो भारतीयों की न्यायालय के प्रति आस्था पर सवाल खड़ा कर देती है क्योंकि जनता न्यायालय को भगवान का मंदिर मानती है जहाँ पर इंसाफ होता है । लेकिन अब भगवान पर ही सवाल खड़ा करना कहा तक सही ये अब समय ही बतायेगा ?

हम बात कर रहे है न्याय की उस न्याय की जिसको पाने के लिए जनता सड़को का सहारा लेती है । जब माता पिता अपनी बच्ची के साथ किया हुआ दुष्कर्म ओर उस दुष्कर्मी को जेल की सलाखों तक पहुचने के लिए उस बच्ची का शव सड़क पर रखकर न्याय की गुहार लागते हुए देखा है इन आँखों ने न्याय पाने के लिए आत्मदाह करते हुए देखा है इन आँखों ने ये सब भारत के विकाशशीलता के पीछे की सच्चाई है। आज ना जाने कितनों लोगो ने न्याय की आस मे अपनी उम्र गुजर दी ना जाने कितनों की बलि चढ़ गई सिर्फ न्याय पाने में, हाल ही मे मध्यप्रदेश में शिक्षिकाे ने अपनी मांगों को लेकर एक अनोखा तरीका अपनाया है ।

भोपाल मे प्रदर्शन कर रहे शिक्षको ने अपने सिर मुंडवा दिए।इस प्रदर्शन में खास बात यह है कि जहाँ पुरुषो ने अपने सिर मुंडवाये वही दूसरी ओर महिलाओं ने भी अपने सिर मुंडवा दिये क्या ये सरकार तक अपनी बात को इन शिक्षकों द्वारा अपनाया हुआ तरीका पहला कदम है या फिर आखरी ये कोई नही जानता कहने का भाव है की आखरी भारत देश मे अपनी बात को या फिर न्याय को पाने का ये कैसे कैसे तरीको को अपनाया जाता है क्या ये तरीके देश की शाख को हानि नही पहुँचा रहे है ?
न्याय पाने के तलाश में करोड़ों भारतीयो के द्वारा उठाया गया यह कदम क्या सही है या फिर गलत ये वही परिवार जानते है जिन की बच्ची की इज्जत को लूटने वाले दरिंदे आज भी खुले आम घूम रहे है ये वही परिवार जानते है जो थानों के चक्कर काट काट काट थक चुके है ये वही परिवार जानते है जिनको समाज मे आज भी छोटी सी गलती होने पर थूक चाटने के लिये मजबूर होना पड़ता है ?

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