हिन्दू संगठनों ने पहुँचाया संजय के घर राशन पानी, दलितों के नाम पर सिर्फ राजनीति चमकाता है जिग्नेश मेवानी

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फरीदाबाद: नेहरू कालोनी के संजय मर्डर केस से जुडी एक पोस्ट सोशल मीडिया पर वाइरल हो रही है जिसमे लिखा गया है कि संजय के पिता का देहांत हो चुका है और संजय की ह्त्या के बाद उसका परिवार चलाने वाला कोई नहीं है। संजय की बूढ़ी माँ बहुत दुखी है। घर में एक समय का भी राशन नहीं है। इस पोस्ट के बाद आज कुछ हिन्दू संगठन मृतक संजय के घर यथाशक्ति राशन व् जरूरी चीजें लेकर नेहरू कालोनी पहुंचे। संजय का परिवार किराए पर रहता है। संजय के अलांवा घर में कोई कमाने वाला नहीं था। संजय की हत्या को कई दिन हो गए कल मौके पर केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गुर्जर मौके पर पहुंचे थे। उन्होंने संजय के परिवार को आर्थिक मदद का आश्वाशन दिया था।
शहर में बहुत नेता हैं लेकिन वोटबैंक के कारण सब खामोश हैं। मृतक संजय के घर की तरफ उनके कदम नहीं बढ़ रहे हैं। संजय दलित था और देश में जिग्नेश मेवानी जैसे तमाम दलित नेता हैं लेकिन किसी न किसी कारण वश वो संजय के घर नहीं पहुँच रहे हैं और संभव है सबसे बड़ा कारण ये हो कि संजय के हत्यारोपी अल्प संख्यक हैं और जिग्नेश को आजादी गैंग का समर्थक कहा जाता है और आजादी गैंग अल्प संख्यकों का गैंग है। इसलिए मेवानी नहीं चाहते है उनके दोस्त उनसे नाराज हो जाएँ। जिग्नेश की बात करें तो आज वो आरक्षण मांगने वाले हार्दिक पटेल के पास पहुंचे थे जो उपवास पर बैठा है। हार्दिक पटेल ने उस तस्वीर को भी ट्वीट किया है जब मेवानी वहाँ पहुंचे थे और लिखा है कि किसानों की क़र्ज़ा माफ़ी और आरक्षण की माँग के उपवास आंदोलन में आज पहले दिन निर्दलीय विधायक @jigneshmevani80 ने समर्थन किया और उपवास छावनी की मुलाक़ात कर वीर भगतसिंह को याद कर कहा संघर्ष..संघर्ष अधिकारों के लिए अंतिम दम तक संघर्ष इंक़लाब ज़िंदाबाद
इस पोस्ट के बाद मेवानी और पटेल को जमकर अपशब्द कहे जा रहे हैं इसका कारण ये है कि हार्दिक ने इस तस्वीर को ममता बनर्जी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव जैसे नेताओं को टैग किया है। लोगों का कहना है कि शायद इन्ही लोगों ने हार्दिक को उपवास पर बैठाया है और ऐसा आम चुनावों के लिए किया जा रहा है क्यू कि जल्द लोकसभा चुनाव हैं। कहने का मतलब दलित नेता भी सिर्फ वोटबैंक की राजनीति करते हैं। उन्हें दलितों के दर्द के बारे में कोई जानकारी नहीं है। दलितों के नामपर को राजनीतिक नौटंकी करते हैं। शायद यही कारण है कि आजादी के कई दशकों बाद भी दलितों के हालात वैसे ही हैं जैसे पहले थे जबकि दलितों को आरक्षण का लाभ भी मिला हुआ है। अगर दलित नेता सच्चे दलित हितैषी होते तो फरीदाबाद के संजय के घर का किचन आज खाली न होता। जहां अन्य लोग राशन लेकर पहुँच रहे हैं। फरीदाबाद में ही सुनपेड़ काण्ड हुआ था जहां देश के तमाम नेताओं ने नोटों की बौछार कर दी थी। जितेंद्र भी दलित था लेकिन सामने वाले सवर्ण थे अल्प संख्यक नहीं थे। यही हाल जुनैद काण्ड में भी देखा गया और वहाँ भी नोटों की बौछार की गई लेकिन बड़े अफ़सोस की बात है संजय के घर रोटी का एक टुकड़ा लेकर भी अभी तक कोई दलित नेता नहीं पहुंचा न ही विपक्ष का कोई नेता पहुंचा।

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