फरीदाबाद की ऐतिहासिक जगह जहां के आस पास कदम रखने वाले बन गए अरबपति

फरीदाबाद: फरीदाबाद में जन्माष्टमी की तैयारियां बड़े धूम धाम से चल रहीं हैं। शहर की सभी मंदिरें दुल्हन की तरह सजा दी गईं हैं। सूरजकुंड रोड स्थित सिद्धदाता आश्रम को भी इस बार ऐतिहासिक तरीके से सजाया गया है। इस आश्रम में भारत के कोने कोने से ही नहीं विदेश के लोग भी आते हैं। फरीदाबाद की ये एक पवित्र जगह है और एक बड़ी कहावत ये हैं कि इस आश्रम के आस पास रहे वाले बहुत जल्द जमीन से आसमान पर पहुँच गए और आज उनकी गिनती शहर के ख़ास अमीरों में शुमार होती है।  आश्रम के पास मानव रचना यूनिवर्सिटी है और भल्ला परिवार को तो आप जानते ही होंगे कि आज ये परिवार देश के नामी गिरामी परिवारों में शुमार होता है ये भी जमीन से आसमान पर पहुंचे हैं। अरावली इंटरनेशनल यहीं हैं और आज उनका भी नाम चमक रहा है। यहीं पास में डिलाइट गार्डन है और डिलाइट नाम भी अब जाना पहचाना नाम हो गया है। कई नेताओं के यहाँ फ़ार्म हाउस हैं और वो भी बड़े मालदार हैं। यहाँ से थोड़ी दूर पूर्व सांसद अवतार सिंह भड़ाना और उनके भाई करतार सिंह भड़ाना का मकान है वो सब भी खास ही हो गए हैं। कहने का मतलब ये जगह ऐतिहासिक है। इस जगह के बारे में विस्तार से कहानियां आगे हरियाणा अब तक पर मिलेंगी। इस जगह पर देश के बड़े बड़ी मंत्री माथा टेकने आये दिन पहुँचते रहते हैं। कुछ जानकारी यहाँ के बारे में जान लें।

गद्गुरु सुदर्शनाचार्य (जन्म: 27 मई 1937, मृत्यु: 22 मई 2007) श्री रामानुजाचार्य द्वारा स्थापित वैष्णव सम्प्रदाय के एक प्रख्यात हिन्दू सन्त थे जिन्हें तपोबल से असंख्य सिद्धियाँ प्राप्त थीं। राजस्थान प्रान्त में सवाई माधोपुर जिले के पाड़ला ग्राम में एक ब्राह्मण जाति के कृषक परिवार में शिवदयाल शर्मा के नाम से जन्मे इस बालक को मात्र साढ़े तीन वर्ष की आयु में ही धर्म के साथ कर्तव्य का वोध हो गया था। बचपन से ही धार्मिक रुचि जागृत होने के कारण उन्होंने सात वर्ष की आयु में ही मानव सेवा का सर्वोत्कृष्ट धर्म अपना लिया था। वेद, पुराण व दर्शनशास्त्र का गम्भीर अध्ययन करने के उपरान्त उन्होंने बारह वर्ष तक लगातार तपस्या की और भूत, भविष्य व वर्तमान को ध्यान योग के माध्यम से जानने की अतीन्द्रिय शक्ति प्राप्त की। उन्होंने फरीदाबाद के निकट बढकल सूरजकुण्ड रोड पर 1990 में सिद्धदाता आश्रम की स्थापना की जो आजकल एक विख्यात सिद्धपीठ का रूप धारण कर चुका है।

1998 में हरिद्वार के महाकुम्भ में सभी सन्त महात्मा एकत्र हुए और सभी ने एकमत होकर उन्हें जगद्गुरु की उपाधि प्रदान की। आश्रम में उनके द्वारा स्थापित धूना आज भी उनकी तपश्चर्या के प्रभाव से अनवरत उसी प्रकार सुलगता रहता है जैसा उनके जीवित रहते सुलगता था। सुदर्शनाचार्य तो अब ब्रह्मलीन (दिवंगत) हो गये परन्तु भक्तों के दर्शनार्थ उनकी चरणपादुकायें (खड़ाऊँ) उनकी समाधि के समीप स्थापित कर दी गयी हैं।

सिद्धदाता आश्रम में आज भी उनके भक्तों का मेला लगा रहता है। यहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय का हो, बिना किसी भेदभाव के प्रवेश की अनुमति है। वर्तमान में स्वामी पुरुषोत्तम आचार्य यहाँ आने वाले श्रद्धालु भक्तों की समस्या सुनते हैं और सिद्धपीठ की आज्ञानुसार उसका समाधान सुझाते हैं। यह आश्रम आजकल देश विदेश से आने वाले लाखों लोगों के लिये एक तीर्थस्थल बन चुका है।आगे की जानकारी बहुत जल्द.

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