आर्थिक आरक्षण: देश के सर्वोच्च पदों पर पहुंचे इन गरीबों ने समझा करोड़ों गरीबों का दर्द

0
77

नई दिल्ली: देश के एक दो नहीं लाखों ऐसे गरीब विभिन्न विभागों में बड़े पदों पर हैं जिन गरीबों ने मेहनत की और एक मुकाम हासिल किया। कई नेता भी इस सूची में शामिल हैं और देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उप राष्ट्रपति भी इसी सूची में हैं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जिनका घर कच्चा था और बारिश के समय में पानी टपकता था तो पूरी रात जागते थे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बड़े परिवार से नहीं हैं। वो चाय बेंचते थे या नहीं लेकिन एक बात सच है कि वो किसी अमीर परिवार से नहीं हैं। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू एक किसान के बेटे हैं, जिन्हे गरीबों और निम्न तबके के हालात बेहतर ढंग से पता हैं। ये तीनों नेता न किसी राजा महाराजा के खानदान से हैं न? लेकिन आज ये देश के सर्वोच्च पद पर हैं।

राजनीति की बात करें तो ये तीनों नेता देश के सर्वोच्च पद पर हैं और इन्होने गरीबी को पढ़ा नहीं गरीबी झेला है। सोशल मीडिया पर इसी खबर से जुडी एक पोस्ट हमने कम पोस्ट की थी कि परेशां की परेशानी, परेशां खूब जाने है, मेरे दिल की परेशानी मेरा महबूब जाने है, ये शायरी हमने इस समय पोस्ट की थी जब रात्रि में राज्य सभा में आर्थिक आधार पर आरक्षण का बिल पास हुआ था।

आर्थिक आधार पर आरक्षण जिसमे सभी वर्ग के गरीब शामिल हैं, मुसिलम, जाट, गुर्जर सहित हर वर्ग के लोगों को इससे फायदा मिलेगा। देश को आजाद हुए 70 साल से ज्यादा हो गए और देश के बड़े पदों पर अब तक बड़े लोग ही देखे गए जिन्होंने गरीबी नहीं देखी है। गरीबी का अर्थ वही लोग जानते होंगे जिन्होंने गरीबी देखी है और उन्हें पता होगा कि कभी कभी खाली पेट भी सोना पड़ता था। आज जब ऐसे लोग बड़े पदों पर हैं तो उन्होंने देश के गरीबों का दर्द समझा और आर्थिक आरक्षण बिल सामने आया। ये बिल उस समय आया है जब लोकसभा चुनाव नजदीक हैं इसलिए बड़े सवाल भी उठाये जा रहे हैं। आपको बता दें कि कुछ चौके, छक्के अंतिम ओवरों में भी लगते हैं ताकि जीत मिले और यही कारण है कि ये बिल इस समय लाया गया। एक दो पार्टियों को छोड़ इस बिल का सभी पार्टियों ने साथ दिया। लोकसभा चुनाव नजदीक होने के कारण ऐसा हुआ वरना विरोध करने वालों की लाइन लग जाती।

गरीब अपना वो दिन नहीं भूलता जब वो भूखे पेट सोया हो भले ही वो किसी राज्य का आका बन जाये या देश के सबसे बड़े पद पर पहुँच जाए। और वो लोग गरीबी कभी नहीं समझ सकते तो गरीबी को किताबों में पढ़ते हैं और बड़े घरानों में उनका जन्म हुआ है। इस बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलनी तय है। सुप्रीम कोर्ट में क्या होता है समय बताएगा लेकिन एक बात सच है कि परेशानी से गुजर चुके लोग ही दूसरों की परेशानी समझ सकते हैं जिन्हे कभी कोई परेशानी नहीं हुई वो किसी की परेशानी शायद ही समझ सकें। दुःख झेलकर बोलने वाले से दुःख का परचा पढ़ बोलने वाला शायद ही कभी जीत सके। कलयुग है यहाँ बहुत कुछ संभव भी है क्यू कि जनता लालची है और नेताओं के लुभावने वादों में फंस भी जाती है। शौंचालय, घर देने वालों को नहीं चुनाव वाले दिन एक पव्वा दारू देने वालों को वोट दे देती है।

LEAVE A REPLY