पिता का 71 देशों में 6 हजार करोड़ का कारोबार, बेटे को 500 रू. देकर भेज दिया मजदूरी करने

Billionaire's Son Stayed in Hyderabad to Understand Value of Money

नई दिल्ली: चांदी की चम्मच हाँथ में लेकर पैदा होने वाली अधिकतर औलादें युवावस्था में आकर बहक जाती हैं, बिगड़ैल औलादें कहलाती हैं। शायद यही कारण है कि जिस शख्स के पिता का 71 देशों में 6 हजार करोड़ रुपये का कारोबार है वो अपने बेटों को बहक जाने का मौका नहीं देता है। गुजरात के सावजी ढोलकिया पिछले साल अपने 21 वर्षीय बेटे द्रव्य को खुद अपने दम पर नौकरी ढूंढने के लिए बाहर भेज दिया था अब दूसरे बेटे के साथ भी उन्होंने ऐसा ही किया है । सूरत में हीरों का कारोबार करने वाले सावजी ढोलकिया ने अपने बेटों को जिंदगी और पैसा कमाने के संघर्ष से रूबरू कराने के लिए एक महीने तक साधारण सी जिंदगी जीने और नौकरी करने को कहते हैं। सावजी की हरे कृष्णा डायमंड एक्सपोर्ट्स कंपनी 6000 करोड़ की है। वहीं उनका करोबार 71 देशों में फैला हुआ है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने अपने दूसरे बेटे हितार्थ ढोलकिया को भी एक महीने के लिए बाहर भेज दिया था। हितार्थ ने हैदराबाद में एक आम आदमी की तरह जिंदगी बिताई। एक महीने के लिए दुनिया के सभी एशो-आराम छोड़कर हितार्थ ने आम आदमी की जिंदगी की तकलीफों और कठिनाइयों का सामना किया। स्थानीय आईपीएस अधिकारी राजीव त्रिवेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में हितार्थ के नजरिए की तारीफ की।

हितार्थ ने अमेरिका में शिक्षा ग्रहण की है और उनके पास डायमंड ग्रेडिंग में सर्टिफिकेट भी है लेकिन हैदराबाद में उन्हें इससे कोई मदद नहीं मिली। हितार्थ ने बताया कि मैं जैसे ही हैदराबाद पहुंचा, नौकरी ढूंढनी शुरू कर दी क्योंकि मेरे पास बिल्कुल पैसे नहीं बचे थे। खुशकिस्मती से सिकंदराबाद में मुझे 100 रुपए में एक कमरा मिल गया। मैं वहां 17 लोगों के साथ कमरा शेयर कर रहा था। मेरा अगला काम था अपने लिए एक नौकरी ढूंढना। 3 दिनों तक भटकने के बाद मुझे एक मल्टीनैशनल फूड जॉइंट में नौकरी मिली। वहां मेरी सैलरी 4000 रुपये थी। मैंने चैलेंज के मुताबिक वहां 5 दिन काम किया और फिर नौकरी छोड़ दी।

हितार्थ घनश्याम घनश्याम ढोलकिया के सातवें लड़के हैं। हितार्थ ने न्यू यॉर्क से मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। फिलहाल वह अपनी छुट्टियों में भारत आए हुए हैं। फैमिली बिजनस में आने से पहले उनके पिता ने उनसे बिना परिवार का नाम इस्तेमाल किए और मोबाइल फोन के बगैर दूर जाकर रहने के लिए कहा ताकि वह जिंदगी के संघर्षों का अनुभव ले सकें। उनके पिता ने हितार्थ को यह भी नहीं बताया कि उन्हें जाना कहां है। उनके पिता ने उन्हें 500 रुपये दिए और एक फ्लाइट टिकट दिया। घर से बाहर आने के बाद हितार्थ ने जब टिकट देखा तो पता चला कि उन्हें हैदराबाद जाकर आम जीवन जीने की चुनौती झेलनी है। हितार्थ 10 जुलाई को हैदराबाद पहुंचे। साथी यात्रियों से उन्होंने हैदराबाद शहर के बारे में जानकारी जुटाई और उसके बाद एयरपोर्ट बस से सिकंदराबाद पहुंचे।

हितार्थ ने सिकंदराबाद में पैकेजिंग यूनिट में काम किया और सड़क किनारे ढाबों पर खाना खाया। वह सिकंदराबाद में एक महीने रहे और एक कमरे में कई अन्य कर्मचारियों के साथ ठहरे। सबसे पहले उन्होंने मैकडॉनल्ड में नौकरी की और उसके बाद एक मार्केटिंग कंपनी में डिलिवरी बॉय का काम किया। वह शू कंपनी में सेल्समैन भी बने। अपने पिता की चुनौती के मुताबिक उन्होंने 4 सप्ताह में 4 नौकरियां कीं और महीने के अंत तक 5000 रुपये कमाए। इस दौरान उन्होंने कहीं भी अपनी पहचान नहीं बताई।

30 दिन पूरे होने के बाद हितार्थ ने अपने परिवार को सूचना दी कि वह कहां रह रहा है। उसके बाद उनका परिवार हैदराबाद आया और उस दुकान में पहुंचे जहां हितार्थ काम करता था।

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