चित्तौडगढ़ की लड़ाई के बाद अपने घर कभी नहीं लौटे गडिया लुहार

 फरीदाबाद 14 सितंबर ( Report By  Gajender Rajput Haryana Ab Tak )  सैकड़ों साल पहले हुई चित्तौडगढ़ की लड़ाई के बाद अपने घरों को छोडकर जगह-जगह रह रहे गडिया लुहार लौटकर न तो अपने प्रदेश गए और न ही घर। अब तो उन्हे पता ही नहीं है कि उनका वहां कोन सा घर था और कहां जमीन थी। कभी यहां तो कभी वहां अपना ढेरा लगाकर लोहा कूटने वाले गडिया लुहारों को बसाने के लिए न तो केन्द्र सरकार ने कभी सोचा और न ही राजस्थान सरकार ने उनकी सुध ली।  आम जरूरत के लोहे के सामान बनाने वाले गढिया लुहार आपको कहीं भी लोहा कूटते हुए मिल जायेगें, लेकिन न तो स्थाई ठौर ठिकाना है और न ही काम-धंधा। केवल औजार बनाकर अपनी जीवन याचिका चलाते है। कच्चे घर या फिर बैल गाडियों में ही इनके बच्चे बढे होते हैं और फिर उसी काम में लग जाते हैं जिन्हें उनके बुजुर्ग करते आएं है। कई सालों पहले महाराणा प्रताप की लड़ाई में उनका साथ देने के लिये घर से निकल कर गडिया लुहारों ने जंगलों में रह रहकर महाराणा प्रताप की सैना के लिये तलवारें बनाई थी, महराणा प्रताप को अपना वंशज कहने वाले गढिया लुहारों को लडाई के भंयकर मंजर के बाद घर-बार छोडना पड़ा था। तब से वे एक से लेकर दूसरे प्रदेश व शहर भटक रहे है और जीवन यापन के लिए गाडियों में ही अस्थाई घर बनाकर लोहे का सामान बनाते है।
इन गढिया लुहारों की माने तो वे कभी लौट कर अपने प्रदेश व शहर नहीं गए। हरियाणा, यूपी व पंजाब में ही उनके लोग अस्थाई रूप से रहकर काम कर रहे है। सरकार ने भी कोई ऐसा कानून नहीं बनाया कि उन्हे फिर से उनके प्रदेश व शहर में स्थापित कर सकें। पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए तो केन्द्र व राज्य सरकार ने कई योजनाएं बनाई। लेकिन अपने ही देश के शरणार्थियों के लिए कोई योजना नहीं बनाई गई। इन लोगों का कहना है कि अब तो वहां दूसरे प्रदेशों के लोग रहते है। कभी वे जाते भी है तो उन्हे भगा दिया जाता है। फरीदाबाद में ही उन्हे अब 40 साल से अधिक हो चुके है। उन्हे तो याद तक नहीं है कि उनके बुजुर्ग कब और कैसे आए थे।
loading...

Leave a Reply

*